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चित चोर

Ashu Shekhawat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चित चोर कहूं,
        
                                                    
                            
या माखन चोर।
युग दृष्टा कहूं,
या  कछू और।

तुझको समझने वाला,
कब दुनिया से बोला।
तेरा ही बन के रह गया,
जिसे भी तुमने तोला।

तुम तक वहीं पहुंचा,
जिसकी खिंचीं डोर।
युग दृष्टा कहूं,
या  कछू और।

मधुबन में जा कर,
धेनू खूब चराई।
सांझ ढले तब जा के,
घर की याद आई।

ऐसे में बता रे कान्हा,
क्यों चला उस और।
युग दृष्टा कहूं,
या कछू और।

छोड़ दिया तो छोड़ दिया,
लोटा नहीं फिर उस और।
ऐसा निष्ठुर किसने किया,
समझा ओं श्याम किशोर।

सारथी बन के साथ रहा,
थामें रहा रथ डोर।
युग दृष्टा कहूं,
या  कछू और।
-आशु सिंह अमिट
एक महीने पहले
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