क्षण भंगुर सा जीवन,
निर्मोही साँसों की डोर,
निष्ठुर सी ख्वाहिशें,
जाएं तो जाएं किस ओर?
लालच की अंगड़ाइयाँ,
जतन भरी चालाकियां,
भरम की कामयाबियां,
और फ़िर ये बेहिसाब दौड़!
जाएं तो जाएं किस ओर?
रंगमंच सा व्यापर,
दमख़म से जुटे सारे क़िरदार,
दृष्टा अनेक,दृष्टान्त हज़ार
पल भर में हो जाये ओझल,
जब खिंच जाए पर्दे की डोर।
जाएं तो जाएं किस ओर?
क्या कुछ पाने को शेष?
जब मिट जाए जो भी विशेष,
आभासी सा सचल सजीव,
सब क्षण भंगुर, मात्र अवशेष।
क्या व्यर्थ यू ही जीवन की दौड़?
जाएं तो जाएं किस ओर?
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