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प्रेम प्राप्ति नहीं, प्रार्थना है

Ashish Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज शाम मौसम बड़ा सुहाना था।
        
                                                    
                            
काले बादल थे, ठंडी-ठंडी हवा थी,
और सच कहूँ तो चाय-पकोड़े वाला मौसम था।
लेकिन मेरे शरीर के नसीब में शायद चाय कहाँ थी...

हम सब बैठे थे,
बातों-बातों में हँसी-मज़ाक चल रहा था।
तभी किसी ने अचानक उसका ज़िक्र छेड़ दिया,
"यार... उसे भी तो चाय बहुत पसंद है ना?"

मेरे होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।
मैंने बड़े प्यार से कहा, "हाँ... और मुझे वो बहुत पसंद है।"

लेकिन सामने वाला मेरी बात कहाँ समझने वाला था।
वह हँसकर बोला,
"बड़ा आया... तू कभी उसकी मिठास बन ही नहीं पाया।"

एक पल को लगा जैसे किसी ने हँसते-हँसते
मेरे भीतर की सबसे गहरी नस पर हाथ रख दिया हो।

वह बोलता गया...
"भले तू महीनों चाय की तरह उबलता रहा,
अपने रंग को छोड़कर उसकी चाय बना दी...
मगर वक़्त के साथ चायपत्ती की असली जगह तो छन्नी तक ही होती है।
होंठों तक तो दूध और शक्कर ही पहुँचते हैं...
चायपत्ती तो आखिर में फेंक ही दी जाती है।"

बस... उसके बाद मेरी आवाज़ कहीं खो गई।
मैं चुपचाप उस महफ़िल से उठकर चला आया।

अपनी उस शांत महफ़िल में, जहाँ सिर्फ़ मैं ही मैं हूँ।
क्योंकि जहाँ द्वैत होता है, वहीं चुभन होती है।
मन की बात मन ही जाने तो अच्छा है।
बाहर ज़िक्र करो, तो अर्थ का अनर्थ होता है,
और अंत में भावनाओं की अर्थी ही सजती है।

फिर मैं अकेला बैठा बहुत देर तक सोचता रहा...
मालूम है मुझे कि चाय बहुत पसंद है तुम्हें,
पर अफ़सोस... मैं उसकी मिठास न बन सका।

- - ✤ - -

मैं तो उस चाय-सा रहा जिसने पानी को अपना रंग दिया,
अपनी ख़ुशबू दी, अपना स्वाद दिया...
मगर जब सफ़र से हमसफ़र की बात आई, तो छन्नी ने मुझे किनारे कर दिया।
मैं तलछट बनकर रह गया, और लोग स्वाद की तारीफ़ करते रहे।

फिर अचानक भीतर से एक और आवाज़ आई...
"क्या सचमुच प्रेम इतना छोटा होता है?"
नहीं...

प्रेम तो प्राप्ति नहीं, प्रार्थना होती है।
प्रेम तो अपेक्षा नहीं, उपासना होती है।
प्रेम तो समर्पण होता है,
समर्पण से समरसता होती है,
समरसता से शांति होती है,
और शांति से परमात्मा का मार्ग खुलता है।
एक दिन प्रेम ही परमात्मा हो जाता है।

फिर समझ आया...
प्रेम वह नहीं जहाँ छन्नी दिखाई दे जाए।
प्रेम वह है जहाँ अलग होकर भी चाय का स्वाद महसूस होता रहे।
प्रेम वह है जहाँ प्याली होंठों से लगे और चेहरे पर अनायास "वाह..." निकल जाए।
प्रेम वह है जहाँ सामने वाला चाहे साथ रहे या न रहे, उसकी खुशी अपनी पूजा बन जाए।

भला वह प्रेम ही कैसा जिससे मन खिन्न हो जाए?
सच्चा प्रेम तो मन को विस्तृत करता है, संकुचित नहीं।

अब मेरी बोली नहीं निकलती...
और शायद अब कभी निकलेगी भी नहीं।
क्योंकि जब शब्द मौन हो जाते हैं, तब आँसुओं के साथ आशीर्वाद निकलते हैं।

हर धड़कन प्रार्थना बन जाती है।
हर साँस पूजा बन जाती है।
हर स्मृति प्रसाद बन जाती है।

- - ✤ - -

अब तुम्हें पाने की हसरत नहीं है।
अब तो बस तुम्हें मुस्कुराते देखने की चाह है।
जहाँ भी रहो, बेख़ौफ़ रहो, आज़ाद रहो।
अपनी हँसी की रोशनी से हर दिशा को आबाद करते रहो।
तुम्हारी आँखों में कभी उदासी का मौसम न ठहरे।
तुम्हारे हिस्से में हर सुबह उजाला आए।
मेरी दुआओँ की छाँव तुम पर बनी रहे।

और मैं...
मैं प्रेम की उस पराकाष्ठा तक पहुँचना चाहता हूँ जहाँ सिर्फ़ प्रार्थना हो।
जहाँ सब कुछ निस्वार्थ होकर निछावर कर देने में ही प्रसन्नता हो।
जहाँ "मुझे क्या मिलेगा" वाली बनिए की बुद्धि को तिलांजलि देकर, सब कुछ लुटा देने का साहस हो।
जहाँ जीवन की शाम होने से पहले अपना हर कतरा अर्पित कर दिया जाए।

अगर कभी किसी बारिश भरी शाम में तुम्हारे हाथ में चाय की कोई प्याली हो...
और उसकी भाप में तुम्हें किसी अनकहे प्रेम की हल्की-सी ख़ुशबू महसूस हो...
तो समझ लेना,
किसी ने तुम्हें पाया नहीं था,
फिर भी उम्र भर तुम्हारी खुशी की दुआ करता रहा।

क्योंकि अंततः...

प्रेम प्राप्ति नहीं, प्रार्थना है।
प्रेम पराकाष्ठा नहीं, परमात्मा है।
प्रेम व्यापार नहीं, विस्तार है।
और जो प्रेम में स्वयं को खो दे, वही सच में स्वयं को पा लेता है।

 
3 महीने पहले
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