तुम्हें सोच के जब मुस्कुराने लगते थे,
पागल समझ के सब भगाने लगते थे।
मैं तुम्हारे शहर से जब गुजरता था,
मुझ पे लोग पत्थर चलाने लगते थे।
तेरे हिज्र में हम इस कदर टूटे थे,
ख़्वाब भी हमको डराने लगते थे।
हम तो चले थे वफ़ा की राहों पर,
लोग मगर काँटे बिछाने लगते थे।
जब भी जलता था चिराग़ उम्मीद का,
अँधेरे ही उसको बुझाने लगते थे।