तुम्हें याद है, जाते वक़्त तुम मेरे लिए एक नाम छोड़ गए थे,
हमारी मोहब्बत के हिस्से में कुछ अधूरे पैग़ाम छोड़ गए थे।
तुम तो चले गए, मगर वो नाम आज भी साथ चलता है,
जिस दिल को अपना कहते थे, उसी में इल्ज़ाम छोड़ गए थे।
मैंने पूछा था तुमसे, “अब तुम्हें क्या कहकर पुकारूँ?”
तुम हँसकर मेरी ख़ामोशी में अपना नाम छोड़ गए थे।
तुम्हें भूलने की कोशिश में उम्र गुज़रती रही मेरी,
तुम मेरी हर धड़कन में अपना एहसास छोड़ गए थे।
अब कोई पूछता है तुमसे मेरा रिश्ता क्या था,
तुम जाने क्या कह गए, हम बस एक नाम छोड़ गए थे।
‘अशफ़ाक़’ वो शख़्स गया तो लगा सब ख़त्म हुआ,
मगर जाते-जाते वो दिल में अपना मुक़ाम छोड़ गए थे।