भोर की पहली किरण से पहले,
जिसके कदमों की आहट जगती है,
ठंडी रातों में चुपके से आकर,
जो माथे पर चादर ढकती है,
वो कोई और नहीं, माँ है।
चूल्हे के धुएँ में आँखें मूँद कर,
उसने हर निवाला मीठा बनाया,
खुद आधा खाकर भी मुस्कुरा दी,
जब हमने थाली में प्यार जताया।
उसकी हथेलियों की लकीरों में,
हमारे बचपन का हर रास्ता छुपा है।
दुनिया की धूप जब भी झुलसाती है,
उसका आँचल बरगद की छाँव बन जाता है,
बिना कहे जो दिल की हर बात पढ़ ले,
वो हुनर सिर्फ उसी को आता है।
दुआओं का वो एक ऐसा समंदर है,
जहाँ हर तूफान आकर ठहर जाता है।
मंदिर की मूरत में क्या ढूँढें खुदा को,
जब साक्षात ममता घर के आँगन में मुस्कुराती है,
माँ के होने से ही घर, घर बनता है,
उसकी एक हँसी से सारी कायनात संवर जाती है।