धाराएं प्रतिकूल हैं,
पाँवो में चुभते शूल है,
चलेगा हर हाल में तू,
ले शपथ,ले शपथ,
अग्निपथ,अग्निपथ,अग्निपथ।
टूटा आज स्वप्न है,
दुख में तू निमग्न है,
फिर भी पा सकता तू,
विजयपथ,विजयपथ,
अग्निपथ ,अग्निपथ,अग्निपथ।
न किसी का साथ है,
गहन सा अंधकार है,
उठ जरा संकल्प से,
चला जरा विजयरथ,
अग्निपथ,अग्निपथ,अग्निपथ।
जीतने का भाव बना,
संकल्प संग चल जरा,
बढ़ा कदम,बढ़ा कदम,
अग्निपथ,अग्निपथ,अग्निपथ।
विजयी ध्वज अब फहरा,
गीत विजय के तू गा,
कुछ जोश से बना,
विजयपथ,विजयपथ,
अग्निपथ,अग्निपथ,अग्निपथ।।
-अरुणिमा बहादुर खरे "वैदेही"