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अधूरा सच

Arunima Bahadur

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक अधूरा सच,
        
                                                    
                            
जो आंखे देखती रही
और अंतःकरण,
रोता रहा।

जी कर ,
अधूरी जिंदगानी,
मन कही,
खोता रहा।

टूटती रही,
रिश्तों की बाते,
मन सोच अपनो को,
दर्द सहता रहा।

जो लगा सुख,
वो सुख न था,
मन के दर्पण में,
दुःख रिस्ता रहा।

भूल कर प्रकृति को,
जब जब कदम भागे,
प्रकृति संग बढ़ने को,
मन सोचता रहा।

एक अधूरा सच बनी,
ये जिंदगानी,
सच जीने को,
मन तरसता रहा।

भोर जिसे समझा,
वो भोर न था,
बाहर के शोर सुन,
मन रोता रहा।

बंद ताला "मै " का,
चाभी बन न सके।
मनुजता के दर्श को,
मन तड़पता रहा।
-अरुणिमा बहादुर खरे 'वैदेही '
एक महीने पहले
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