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अपने घर की स्त्रियों से नहीं बनती

ARUNI KUMARI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपने घर की स्त्रियों से नहीं बनती…
        
                                                    
                            
कभी-कभी घर की स्त्रियों से ही नहीं बनती,
क्योंकि वहाँ रिश्तों से ज़्यादा तुलना,
प्यार से ज़्यादा प्रतिस्पर्धा,
और अपनापन दिखाने से ज़्यादा कमियाँ गिनाने की परंपरा होती है।
अजीब विडंबना है—
बाहर की औरत की तकलीफ़ पर हम बड़ी आसानी से कहते हैं,
"बेचारी… उसे समझने वाला कोई नहीं।"
और घर की ही किसी स्त्री के हिस्से में दर्द आए,
तो सबसे पहले पूछते हैं—
"इसमें इसकी ही कोई गलती होगी।"
मुझसे नहीं बनती तो नहीं बनती,
हर रिश्ता निभाना ज़रूरी नहीं,
कुछ रिश्तों में सम्मान की दूरी ही सबसे सुंदर शांति होती है।
अब मैंने भी सीख लिया है—
हर ताने का जवाब देना ज़रूरी नहीं,
हर गलतफहमी दूर करना ज़रूरी नहीं,
और हर किसी को खुश रखना तो बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं।
मैं बुरी नहीं हूँ,
बस अब हर जगह अच्छी बनने की कोशिश छोड़ दी है।
और हाँ,
जो स्त्रियाँ दूसरी स्त्री को गिराकर खुद को ऊँचा समझती हैं,
उन्हें शायद एक दिन समझ आएगा—
किसी और की रोशनी बुझाने से अपनी रोशनी तेज़ नहीं होती।
मैं अपनी राह चलूँगी,
थोड़ी चुप, थोड़ी मजबूत,
और पहले से कहीं ज़्यादा अपने लिए। 
एक महीने पहले
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