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सोचा न था कभी दिन

Arun Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सोचा न था कभी दिन , ये देखना पड़ेगा,
        
                                                    
                            
अपने ही क़ाफ़िले को , रहबर ही लूट लेगा।

हम तो समझ न पाए , इस ना - ख़ुदा के मन की,
मझधार में ये लाकर , कश्ती को छोड़ देगा।

हालात बद से बद्तर, होते ही जा रहे हैं,
माली चमन उजाड़े , कैसे चमन बचेगा।

बच्चों के साथ जब ये , अन्याय हो रहा है,
इस देश का मुक़द्दर , कैसे बता बनेगा।

इतनी ये ज़िद तुम्हारी , नुकसान ही करेगी,
जनता के आगे इक दिन , झुकना तुम्हें पड़ेगा।
-- अरुण शर्मा 
2 महीने पहले
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