मुसाफिर हूं चलते रहना ही नियति मेरी
इक दिन तेरी यादों से भी चला जाऊंगा
पर जाने से पहले डूबते हुए सूरज की तरह
मन क्षितिज पे अपनी चमक छोड़ जाऊंगा
जीवन पथ जब कभी धुंधला दिखाई देने लगे
किसी चौरस्ते पे किधर जाऊं मन दुविधा में लगे
प्रिय तब अपनी आंखें मूंद कर हृदय में झांकना
अंतर्मन की रोशनी में मार्ग प्रशस्त हो जाएगा