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मैं कौन हूँ?

Arpita Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            “मैं कौन हूँ?”
        
                                                    
                            

यह सवाल है या पहेली?
समझना कठिन है...

मैं कौन हूँ?

मुझमें कई ‘मैं’ रहते हैं।

एक, जो अब भी अपने बचपन में है
शैतानियाँ करता है, ज़ोर से हँसता है और सब भूल जाता है।

एक, जो अभी ज़िम्मेदारियाँ सीख रहा है,
सीख रहा है दुनिया के साथ चलना,
दुनियादारी करना।

एक, जो अपना अस्तित्व बनाने के लिए भाग रहा है,
अपने सपनों के लिए बाँहें फैलाए दौड़ रहा है।

एक, जो अंदर कहीं सिमटा हुआ है
या यूँ कहें, छिपाया गया है।
दर्द और निराशा लिए चुपचाप बस बैठा है।

आना चाहता है बाहर,
चाहता है कि उसे भी कोई देखे,
लेकिन कमज़ोर कहलाने के डर से
चुपचाप छिपा बैठा है।

और एक, जो शांत है
एक हल्की ठंडी हवा की तरह,
समुद्र की ख़ामोश लहरों सा,
सुबह के सूरज की पहली किरण
और साँझ की आख़िरी किरण सा...

मैं इन सबका संगम हूँ।

इसलिए मुझे समझना,
सिर्फ़ मुझे देख लेना नहीं है।

मुझे समझना यानी
मेरी उस गहराई तक उतरना,
जहाँ आज तक कोई जा नहीं सका।
1 सप्ताह पहले
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