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आँखें, हाँ यही पलकें और भौंहें वाली

Arnika yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आँखें, हाँ यही पलकें और भौंहें वाली
        
                                                    
                            

एक रोज़ जब देखा उसे, चमक उठी किसी मोती की तरह
पुतलियाँ बड़ी होकर खुद में समाना चाहने लगी उसकी तस्वीर को
आकांक्षा की बस खुद को भर के उसे निहारने की
देखते ही उसे चंचल होने लगी ये

आँखें, हाँ यही पलकें और भौंहें वाली

आई जब बारी उससे दूर जाने की
पीछा किया बड़ी बेसब्री से उसके ओझल होने तक
खुद में मोती भर के बस निहारती रही उसको
अंततः मनाया खुद को ये कह कर
कि जाते समय नहीं गिराते मोती के दो बूंद

आँखें, हाँ यही पलकें और भौंहें वाली

अब बस इंतज़ार करती हैं किसी रोज़ उसके दिख जाने का
जानती हैं नहीं दिखेगी वो मनमोहक तस्वीर
फिर कभी उसके दिखने की आस में गिराती हैं दो मोती
कभी गिराती हैं कई मोतियाँ उसके न दिखने की निराशा में

आँखें, हाँ यही पलकें और भौंहें वाली
एक महीने पहले
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