विज्ञापन

सवाल अभी ज़िंदा है

Arjun

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मत मुझसे मेरे कपड़ों का रंग,
        
                                                    
                            
मेरी जेब का हिसाब मत पूछो।
अगर पूछना ही है,
तो उस किसान से पूछो
जिसकी हथेली में आज भी
कर्ज़ की लकीरें हैं।

उस मज़दूर से पूछो
जो शहर बनाता है,
पर अपने बच्चों के लिए
दो वक्त की रोटी जुटाता है।

और मुझसे पूछो तो बस इतना पूछो—
क्या सच बोलना आज भी सबसे बड़ा अपराध है?

मैंने देखा है—
एक तरफ़ भूख रात भर जागती है,
दूसरी तरफ़ थालियों में
रोटियाँ नहीं, दिखावा बचता है।

कहते हैं—देश बदल रहा है।
हाँ, बदल रहा है...

पर क्या इतना बदल गया
कि किसी बच्चे की किताब
उसकी जात पूछना छोड़ दे?

क्या इतना बदल गया
कि किसी मज़दूर का पसीना
उसकी मजबूरी से सस्ता न हो?

मैं किसी सिंहासन का कवि नहीं,
मैं उन गलियों की आवाज़ हूँ
जहाँ सपने भी
रोज़ मज़दूरी पर जाते हैं।

मेरी कविता तालियों के लिए नहीं,
इंसानियत के लिए है।

मैं नफ़रत नहीं लिखता,
मैं बराबरी लिखता हूँ।

मैं बदला नहीं माँगता,
मैं न्याय माँगता हूँ।

याद रखना—
जब भी कलम उठाना,
किसी के विरुद्ध नहीं,
किसी के अधिकार के लिए उठाना।

क्योंकि...
जिस दिन इंसान की पहचान
उसकी जात नहीं, उसका चरित्र होगा—
उसी दिन भारत सचमुच महान होगा।
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all