मत पूछो मेरी जात क्या है,
मत पूछो मेरा नाम।
मैं उस माटी की संतान हूँ,
जिसका झारखंड है धाम।
मेरे माथे पर साल का जंगल,
आँखों में नदियों का नीर।
मेरी साँसों में गूँज रहा है,
बिरसा का अमर रणधीर।
मैंने देखा तीरों को बोलते,
मैंने देखा पर्वत गाते।
सिदो-कान्हू की हुंकारों से,
साम्राज्य भी थर्राते।
यहाँ महुआ की महक बसी है,
यहाँ पलाश का रंग।
यहाँ ढोल, मांदर की थापों पर,
धड़कता हर एक अंग।
यह धरती केवल खनिज नहीं,
यह सपनों का संसार है।
इसकी हर मुट्ठी मिट्टी में,
शहीदों का अधिकार है।
नदियों का पानी कहता है—
मत मुझको गंदा होने दो।
जंगल की हर पत्ती बोलती—
मुझको यूँ मत खोने दो।
हम विकास के साथी हैं,
पर प्रकृति की शर्तों पर।
ऐसा कल निर्माण करें,
जो हो अपने कर्मों पर।
चलो जलाएँ ज्ञान का दीप,
हर गाँव, हर चौपाल।
झारखंड की नई सुबह हो,
हर चेहरे पर खुशहाल।
आओ मिलकर प्रण ये लें—
न झुकेंगे, न बिकेंगे।
माटी, जंगल और इंसानों का,
सम्मान सदा लिखेंगे।
क्योंकि...
झारखंड कोई नक्शा नहीं,
यह दिल की पहचान है।
जिसे जोहार कहना आता है,
वही इसकी सच्ची शान है।