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सत्ता क्यों बौराई है

अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस ओर उजाला कब होगा,
        
                                                    
                            
है स्याह अंधेरा घना बहुत,
सूरज तो रोज निकलता है,
पहुंचती नहीं रौशनी यहां,
इनके कुनबे में अंधेरा है,
है तीक्ष्ण बहुत बुद्धि लेकिन,
जिनकी प्रतिभा पर पहरा है,
कैसे लिखें उज्जवल भविष्य,
जिनके पांवों में बेड़ी है,
ऐसा छल कुदरत ने ना किया,
फिर कौन बदलता है कुदरत,
हैं योग्य भटकते यहां बहुत,
हक अधिकारों पर पहरा है,
क्यों न्याय की लाठी है अंधी,
दिन-रात बरसती निबलों पर,
ऐ अब भी हैं शाकाहारी,
बहुतेरे शुद्ध सात्विक हैं,
मदिरा और मांस नहीं छूते,
राष्ट्र प्रेम हृदय में गहरा है,
प्रतिवाद नहीं करते ऐ कभी,
बरसों देखा देश की सत्ता में,
अन्याय है और कुटिलाई है,
हर कदम पे छल और धोखा है,
जन सत्ता क्यों बौराई है,
आजाद हुए बीते बरसों,
इनकी उन्नति नहीं आई है,
सूखी रोटी खाली थाली,
रोते हैं बहुत दिल रोता है,
भरपेट अन्न की खातिर जब,
इनका कुनबा भी रोता है,
व्यंजन मिलते बस दावत में,
घर में तो सूखी भांग नहीं,
कब चेतेगी सत्ता आखिर,
इनकी कोई अनुचित मांग नहीं,
हक अधिकारों की बात करें,
यह जुर्म कहां कब होता है,
सूखे आंखों के आंसू भी,
हर ज़ुल्म सहे चुप रहते हैं,
चाहते यही सब प्रगति करें,
सबको ऐ राह दिखाते हैं,
नेकी पर चलना देश का हित,
सबको समाज में सिखाते हैं,
खुद शोषित रह कर भी ऐ सदा,
सबको सच्ची राह दिखाते हैं।।
एक महीने पहले
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