विज्ञापन

कुलबुलाता है आदमी

अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उलझनों को तौल कर
        
                                                    
                            
बुद्धि के तराजू में
बेबस लाचार सा दुनियां में
नजर आता है जब आदमी
सभ्यता की समझ को
झुठलाता है जब आदमी
कूद पड़ता है अक्सर
अनैतिकता के संसार में
पवित्रताऐं बचाने की खातिर
खुद अपवित्रताओं के दलदल में
धंसता ही चला जाता है आदमी
मुक्ति का मार्ग भी बन जाता है
एक नई दासता का द्वार
हिम्मत के साथ एक नए मार्ग पर
शांति की तलाश में अक्सर
एकांत में निकलता है आदमी
बौराए से उस इंसान को
समझना मुश्किल है बहुत
हृदय की धड़कनें जब रूक जाती हों
कभी अचानक
निश्चल निश्चेष्ट रहकर
कहां कुलबुलाता है आदमी
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all