उलझनों को तौल कर
बुद्धि के तराजू में
बेबस लाचार सा दुनियां में
नजर आता है जब आदमी
सभ्यता की समझ को
झुठलाता है जब आदमी
कूद पड़ता है अक्सर
अनैतिकता के संसार में
पवित्रताऐं बचाने की खातिर
खुद अपवित्रताओं के दलदल में
धंसता ही चला जाता है आदमी
मुक्ति का मार्ग भी बन जाता है
एक नई दासता का द्वार
हिम्मत के साथ एक नए मार्ग पर
शांति की तलाश में अक्सर
एकांत में निकलता है आदमी
बौराए से उस इंसान को
समझना मुश्किल है बहुत
हृदय की धड़कनें जब रूक जाती हों
कभी अचानक
निश्चल निश्चेष्ट रहकर
कहां कुलबुलाता है आदमी
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी