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कोई किसी का नहीं

अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम रहते हैं जिस दुनियाँ में, खुदगर्ज यहाँ बहुतेरे हैं।
        
                                                    
                            
बस अपने मतलब की ख़ातिर, झूठी यारी जो निभाते हैं।
और पड़े ज़रूरत जब उनकी, मुँह फेर खड़े हो जाते हैं।
देखा है अक्सर उनको, बस अपना भला ही करते हैं।
जब पड़े मुसीबत में कोई, यारों कि फिकर नहीं करते हैं।
दौलत से तौलने वालों को, धनवान ही मन को भाते हैं।
तुम चीर कलेजा भी रख दो, वो बस संदेह जताते हैं।
ऐसे मतलब की दुनियाँ में, बस प्रभु का एक सहारा है।
खुदगर्जी से जो दूर रहें, उनको ही मिलता किनारा है।
कोई लाख भलाई कर ले पर, खुद उसका भला नहीं होता।
हमने देखा है दुनियां में, यहां कोई किसी का नहीं होता।
-अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
एक महीने पहले
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