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दिए की लौ

अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस दिए की लौ,
        
                                                    
                            
क्यूं इतनी थरथरा रही है,
कहीं बुझे ना देखो तो जरा,
ना कोई आंधी ना कोई तूफां,
फिर क्यूं ऐ इतना कंपकंपा रही है,
यही तो हालत है तेरी बंदे,
समझ सका ना तूं खेल इतना,
ऐ दर्द जो है दिल में तेरे,
समझ सका ना कोई जहां में,
ना कोई आंधी ना कोई तूफां,
फिर क्यूं तूं इतना घबरा रहा है,
जरा सी पत्तों की सरसराहट,
जरा सा उठता हवा का झौंका,
जरा सी बढ़ती है दिल की धड़कन,
तूं होश खो कर है बहका-बहका,
2 महीने पहले
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