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दर्द अपने

अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऐ अश्क जो आंखों से बह रहे हैं
        
                                                    
                            
बता रहे हैं है जख्म गहरा
मगर किसी की खता नहीं है
गुनाह अपना है दर्द अपने
ऐ जो बगावत की बू उठ रही है
बड़ी तबाही का सबब बनेगी
ऐ वक्त जो ठहरा सा लग रहा है
खमोशी है ऐ तूफां से पहले
बस ऐ खता आजकल हो रही है
वो लाख दे रहे हैं दलीलें
किसी को सच पर यकीं नहीं है
इसी भरम में सब जी रहे हैं
अब वक्त बदलेगा होगी रौनक
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
3 महीने पहले
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