ऐ अश्क जो आंखों से बह रहे हैं
बता रहे हैं है जख्म गहरा
मगर किसी की खता नहीं है
गुनाह अपना है दर्द अपने
ऐ जो बगावत की बू उठ रही है
बड़ी तबाही का सबब बनेगी
ऐ वक्त जो ठहरा सा लग रहा है
खमोशी है ऐ तूफां से पहले
बस ऐ खता आजकल हो रही है
वो लाख दे रहे हैं दलीलें
किसी को सच पर यकीं नहीं है
इसी भरम में सब जी रहे हैं
अब वक्त बदलेगा होगी रौनक
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी