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चले आओ

अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक बार चले आओ
        
                                                    
                            
इन अंखियों की ज्योति हो तुम
प्राणों के प्रिय मोती हो तुम
घुटनों के बल चल कर आओ

आ जाओ धूल लपेटे तन में
मिट्टी मुख में भर कर आओ
रोते हंसते गिरते पड़ते
पालना छोड़ कर आ जाओ

दधि दूध और माखन मिश्री
जो मन भावे ओ पा जाओ
हम नैन बिछाए बैठे हैं
हे मन मोहन अब आ जाओ
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
एक महीने पहले
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