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कुछ ख्वाब ऐसे भी है

Apurva bajpai

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ईश्वर की दी हुई अमानत हर एक बेटी होती है...
        
                                                    
                            
नन्हे कदमों से बड़े होने तक आंगन को महका देती हैं...
वो मान है अभिमान है हा थोड़ी नादान भी है...
पर घर से निकल कर इस जहां में भरती उड़ान भी है...
सीखाते है लोग यहां बेटी दो कुलों की लाज है...
ये भी सिखाओ की हौसले की बुलंदियों पर ही नाज है...
बड़े बेबुनियाद से समाज के नियमों का चलता राज है...
बेटी के सपनों को नहीं शादी को अहमियत बनना यहां का रिवाज़ है...
ससुराल में भी ताना देंगे उलहाना देंगे कि बचपन से अपने घर से क्या है सीखा...
अब उन्हें कैसे समझाऊं बचपन से आज तक क्या सुनते बीता...
कानों गूंजते रहते जो शब्द और लगते है जैसे हो ताना...
ऐसे न समझ सकते उन शब्दों को पड़ेगा मुझे बताना...
अगर छू जाये मन को तो ये शब्द अपने घर में बेटियों से कभी न दोहराना...
तुम तो हो पराया धन ये घर नहीं है तुम्हारा तुम्हे तो अपने घर है जाना...
नहीं है शौक मेरे शादी कर के किसी की दुल्हन बन जाऊं...
ख्वाहिश है उस से पहले मैं अपना लिये खुद का घर बनाऊं...
चन्द्र ईंटे ही सही भले उस घर में आ सके...
ख्वाब है इतना वहां की हर एक ईट मुझे मेरे नाम से बुला सके...
जहाँ हर किसी के मुंह निकलता एक ही स्वर हो...
हर माँ बाप को अपनी बेटी पर गर्व हो...
समाज तभी बदलेगा जहा सब कहेंगे यही ससुराल के शादी के सपने बाद में सजाओ...
सबसे पहले बिटिया रानी तुम इस जहां को अपनी पहचान से रूबरू कराओ...
3 महीने पहले
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