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काशी के घाट

aprajita singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            विपुल वैभव की धारा में, काशी नगरी अपार,
        
                                                    
                            
जहां बहती है मोक्ष की गंगा, जीवन का विस्तार।
विहंगम घाटों पर सजी, अद्वितीय संस्कृति महान,
हर पत्थर पर बसी हो जैसे शिव की अमर पहचान।

मनुष्यों की आशा में बसे, स्वप्नों के जो प्रतिरूप,
यहां घटता है समय जहां, शाश्वत बनता स्वरूप।
विराट धाम का यह भूखंड, जहाँ मुक्ति का है सूत्र,
निसर्ग के हर कण में छिपा है, शिव का दिव्य ध्रुवतारा।

त्रिशूलधारी महादेव, सदा यहां प्रतिष्ठित हैं,
कण-कण में बसी महिमा, हर धड़कन शिवमय है।
जहाँ नीलकंठ के चरणों में, अनंत गाथा गूंजे,
वहां शांत अमर उजियारा, अद्वितीय प्रेम धुंधले।

काशी की हर गली कहे, ‘जय महादेव’ का मंत्र,
मृत्यु भी जहाँ आती है, शिव की गोद में अमंत्र।
काल स्वयं यहाँ रुकता है, शिव के चरणों तले,
हर प्राण यहाँ पाता है, निर्वाण के अगणित तले।

अघोर का यह धाम जहां, समाहित है सब कुछ,
हंसता खेलता जीवन हो या हो अंतिम सत्य का दुख।
मणिकर्णिका का दृश्य अद्वितीय, जहां जलते हैं दीप,
वहां शिव के आशीर्वाद में मिलता, परम शांति का संधिपत्र।

गंगा की लहरों में समाहित, यह नगरी है महान,
साधुओं की तपस्या से पावन, शिव के चरणों का मान।
यहां आकर होता है, हर कष्ट का नाश,
जहां शिव और गंगा मिलते, वहाँ मुक्त हो जाता हर वास।

काष्ठ हो या हो जीवित तन, सबका ध्येय एक ही है,
शिव के चरणों में सिमटता, जीवन का यह संचित क्षण।
काशी नगरी, वह अमर भूमि, जहां शिव सदा बसते,
युग-युगांतर तक बने रहेंगे, इस धरा पर देव अद्वितीय।

जहां धुंधला होता हर सत्य, शिव के नाम से प्रखर,
वहां हर प्राण कहता है, "हर-हर महादेव" का स्वर।
काशी नगरी अद्वितीय, शिव का परम धाम है,
जहाँ मृत्यु भी हंसकर कहे, 'मोक्ष ही मेरा नाम है।'
2 वर्ष पहले
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