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गिलहरी रानी

anurag tiwary

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ढलती हुई इस शाम को
        
                                                    
                            
जब ठंडी हवाएं झूला रहीं थीं पेड़ों के साख, उनकी डालियां, उनके पत्ते, उनपे लगे फल और फूल।
तभी दो बुलबुल चिड़ियाँ आके छत के एक छड़ पे बैठतीं हैं, थोड़े से आराम के लिए।
कि एक गिलहरी उंगलियों से अपना कान खुजाते, पूछों को झालते हुए,
चली आ रही थी मतवाली चाल में उस रेलिंग पर दौड़ते- दौड़ते।
ये देख ज़रा घबरा के एक बुलबुल उड़ के भागती है वहां से दूसरी तरफ।
उसका संगी भी भला क्यों रुके अब वहां?
पहले तो गिलहरी उस छड़ पे उनकी जगह लेती है। फिर कपड़े सुखाने वाली रस्सी से हो कर जा बैठती है सबसे ऊपर बंधे उस बांस पे।
मानों कह रही हो सबसे कि _
" यहाँ की महारानी मैं " !
3 महीने पहले
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