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मोहब्बत का ये आलम है

Anurag Bajpai

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चली फिर हौले हौले से
        
                                                    
                            
हवा की बेख़ुदी देखो,

तुम्हारे गीत गाती हैं
ज़रा इनकी ख़ुदी देखो,

मोहब्बत का ये आलम है
के कांटा फूल बन जाए,

के तू शरमाई ऐसे क्यूँ
झुकी है ये कली देखो,

चली फिर हौले हौले से
हवा की बेख़ुदी देखो,

ये रिमझिम सी जो बारिश है
ये कोई गीत गाती है,

तुम्हारी याद में देखो
हमें कितना भिगाती है,

नज़र भर के ज़रा देखो
के घायल तीर हो जाए,

चाँद इतराए ख़ुद पे क्यूँ
है उसकी कौमुदी देखो,

चली फिर हौले हौले से
हवा की बेख़ुदी देखो,

यूँ तो हर रात ख़्वाबों में
चले आते हो तुम मेरे,

गुमा ख़ुद पे हो आता है
जो कहते हो सनम मेरे,

ये गेसू जो हटा लो तो
नूर का दीद हो जाए,

तेरे अपना ही कहने से
हो गए इंगुदी (विशाल) देखो,

चली फिर हौले हौले से
हवा की बेख़ुदी देखो,

उठाये हाँथ जब अपनें,
ख़ुदा से तुझको मांगा है,

जागती आँख में देखो,
तेरा ही ख़्वाब जागा है,

प्यास मिटती नहीं अपनीं
ये पपिहा अब किधर जाए,

जो तुझको याद आ जाऊं,
पाओ पलकें मुंदी देखो,

चली फिर हौले हौले से
हवा की बेख़ुदी देखो,

 
2 महीने पहले
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