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सिस्टम का चक्रव्यूह:लाचार शिक्षित युवा

anuradha sahani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब हम छोटे थे तो चोटें नहीं थीं,
        
                                                    
                            
घाव जो लगते थे, बिन मरहम के भरते थे।
माँ के आँचल तले दर्द को पनाह न मिलती थी,
हम खेलते थे और बस खुश रहते थे।
जिंदगी की परवाह हम कहाँ करते थे,
क्योंकि हमारे पास विकल्प बहुत से रहते थे।
कभी इंजीनियर, कभी डॉक्टर,
कभी कल्पना चावला, तो कभी कलाम बनते थे।
सोचते थे मेहनत से सब कुछ मिल जायेगा एक दिन,
क्योंकि हम केवल अपनी पढ़ाई पर विश्वास रखते थे।
टॉपर रहे हमेशा स्कूल और कॉलेज में,
लगता था मैं ये भी कर सकता हूँ और वो भी,
साइंस और आर्ट्स दोनों ही अच्छे लगते थे।
किताबी परीक्षाओं के वो हसीन दिन खत्म हुए,
मेरी जिंदगी की असली परीक्षा अब कॉलेज के बाहर शुरू हुई।
एक कमरे में बंद, टेबल और किताबों के संग उम्र ढलती रही,
इसी उम्मीद में कि इस काली रात का एक नया सबेरा होगा।
बलिदान किया है जितनी रातों का,एक दिन जरूर हिसाब होगा
पर वक़्त की मार देखो, जो दोस्तों का एक बड़ा झुंड था,
वो सिमट कर अब उंगलियों की गिनती पर आ गया।
इंतजार करते-करते थक गए दोनों ही और,
घरवालों के दबाव में प्रेमिका को कोई और ब्याह गया।
सिर के बाल उड़ गए, आँखों पर मोटे चश्मे लग गए,
ना प्यार नसीब हुआ, ना समाज ने इज़्ज़त दी
क्योंकि इज़्ज़त तो सिर्फ नौकरी को मिलती,
मैं ठहरा पढ़ा-लिखा बेरोजगार
कोई नही अपनी बेटी देने को हमे तैयार
हर एग्जाम में फेल हुए,
पड़ोसी और रिश्तेदारों के तीखे तानों को झेल गए।
कल तक प्रशंसा करने वाले, आज आलोचना करने लगते हैं,
तो वो शब्दों के तीर इस सीने में बड़ी चुभते हैं।
पर ये सब भी चुपचाप सह लिया मैंने,
पर जब वक़्त ने अपनी करवट नहीं बदली,
तो धीरे-धीरे मेरे अपने परिवार ने भी मुंह मोड़ लिया।
खुद को आइने में देख अब यकीं नहीं होता,
गूंजती थीं तालियां जिस टॉपर के लिए कभी,
आज उसके नसीब में सिर्फ तिरस्कार और रोना लिखा।
क्या कमी थी मेरी मेहनत में? कहाँ मुझसे गलती हुई?
क्या सच मे ये मेरी नाकामी थी?
या मैं इस सड़े हुए सिस्टम के चक्रव्यूह में फंस गया?
दोष सिर्फ हमारा है या इन निकम्मी सरकारों का भी?
जहाँ पेपर लीक, धांधलेबाजी और कॉपी चेकिंग में गड़बड़ी है,
जहाँ रसूखदारों के लिए रातों-रात बदल दी जाती कॉपियां सारी हैं।
कभी पेपर में ढेरों गलतियां, सौ प्रश्न भी आयोगों से सही नहीं बनते,
कभी आउट ऑफ सिलेबस पूछ कर ये अफसर करते अपनी मनमानियां हैं,
तो कभी आरक्षण के अंतहीन मसलों पर प्रतिभावान दे देते कुर्बानियां हैं।
ये दर्द, ये आंसू, ये बेबसी हम अब किसको समझाएं?
देश में बदलाव लाने की सोचने वाले ही आखिर इतना कष्ट क्यों उठाएं?
लगता है पढ़ना अब अभिशाप हो गया है,
पढ़े-लिखें युवाओं का दर्द अनसुना है
भ्रष्टाचार की भेंट अब शिक्षा व्यवस्था भी चढ़ा है।
-अनुराधा कामेंद्र साहनी
3 महीने पहले
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