मेरे दर्द से अब उसे कोई मलाल नहीं होता,
जो चाहत थी कभी, वो आँखों का सवाल नहीं होता।
हाल-ए-दिल बयां करूँ भी तो वो सुनता नहीं,
वो पास तो है, मगर उसमें मेरा एहसास नहीं होता।
अगर वो सच में मेरा सच्चा हमसफ़र होता,
तो धड़कन बनकर मेरे ही सीने में धड़कता।
साँसें तो चलती हैं यहाँ मेरी बदस्तूर मगर,
इन आती-जाती साँसों में अब वो नहीं होता।
दर्द-ए-दास्ताँ सुनकर भी दिल उसका नहीं पिघलता,
गले तो लगाता है, पर उस गले लगने में वो अपनापन नहीं होता।
मोहब्बत सिर्फ उसके लफ्ज़ों का एक दिखावा है,
करीब होकर भी करीब होने का गुमां नहीं होता।
फासलों का यह मंज़र भी अब उसे नहीं खटकता,
मैं महफ़िल में रहूँ या न रहूँ, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
-अनुराधा कामेंद्र साहनी