धर्म के नाम पर हथियार उठाते हो,
मासूमों का खून खुद बहाते हो।
अपनी बुज़दिली को धर्म की आड़ में छुपाते हो,
लेकर अल्लाह और ईश्वर का नाम,
शर्म न आती तुमको, सरेआम कत्ल-ए-आम कर जाते हो!
भविष्य जब पढ़ेगा इतिहास,
तुम्हारे इस कलंकित कुकृत्य को कभी न करेगा माफ़।
थे कितने नासमझ तुम,
जो धर्म के नाम पर बँटे,
बँटे तो बँटे,
खुद कटे और दूसरों को काटे।
रूह न जगी, आग न लागी,
इंसानों को मारकर भी इंसानियत न जागी।
भारत-पाक के चक्कर में,
सत्ता और लालच के वश में,
हिन्दू-मुसलमान किया।
बात जब न बनी तो,
धर्म के नाम पर हिंसा को बढ़ावा दिया।
सोचती हूँ जब उस निर्मम रात को,
जब अपनों ने ही अपनों को मारा।
सिहर उठती हूँ मैं,
वो मंज़र कितना घिनौना और कलंकित था!
कोई मुझे समझा दे,
खुदा क्यों चाहेगा कि इंसान ही इंसान को सज़ा दे?
बहुत बह चुका खून धरा पर,
अब तो यह संहार थमे।
जात-पात और मज़हब से उठकर,
हर दिल में बस प्यार रमे।
मानव की भाषा मानवता हो,
धर्म उसका बस इंसानियत की रक्षा हो।
-अनुराधा कामेंद्र साहनी