एक नाम की तलाश थी,
जो कई बार
किस्सों-कहानियों में सुना था।
टीवी, अख़बारों में बड़ा था,
पर हक़ीक़त में
उस नाम जैसा ही कोई चाहिए था।
मिला भी—
“नीला रंग तुम्हें पसंद है ना?”
“मेरा भी पसंदीदा रंग है।”
“तुम पागलखाने से आई हुई लगती हो।”
“क्यों?
तुम भी साथ थे क्या वहाँ?”
कितना बोलती हो तुम,
मेरे तो कान दुख गए।
सबके साथ ही ऐसी रहती हो,
या मैं कुछ ख़ास हूँ?
तुम्हें तो म्यूज़ियम में रखना चाहिए,
देखने वालों की लाइन लगेगी।
तुम ही तो हो
जो मुझे झेल लेती हो,
नहीं तो किसी और में
वो बात कहाँ।
“वेस्टर्न कपड़ों में
अपनी एक तस्वीर भेजो ना,
तुम मेरे लिए
इतना नहीं कर सकती?”
“तुम्हारी कौन-सी रेल
छूटी जा रही है,
थोड़ी देर और बात करो ना।”
शायद यहीं से
कुछ अनकहा
धीरे-धीरे अपना नाम ढूँढने लगा था।
फिर एक दिन—
“क्या हुआ?
आज मैसेज का जवाब नहीं दिया।”
“मेरे पास और भी
बहुत काम होते हैं
इसके अलावा।”
“तुम तो पीछे ही पड़ जाती हो,
तुम्हें क्यों जानना है मेरे बारे में?”
फिर—
“अच्छा सुनो,
एक बात पूछूँ...”
और उसके बाद
एक लंबी खामोशी।
कुछ दिन,
कुछ हफ्ते,
कुछ महीने बीते—
न कोई जवाब आया,
न कोई फोन।
कुछ समय बाद
फिर से बातों का सिलसिला शुरू हुआ।
“तुम ठीक तो हो ना?
क्या चल रहा है?”
“अच्छा सुनो,
मुझे तुमसे प्यार हो गया है।”
फिर उसी सांस में—
“भूलकर भी
इस दायरे को कभी पार मत करना।”
और मैं...
“मुझे नहीं सुनना,
कुछ तो अपना
आत्मसम्मान रखो।”
फोन को हाथ में लिए
मैं उसी के सामने रो रही थी।
लगा—
उधर से कोई जवाब आएगा।
थोड़ी देर की खामोशी के बाद—
“तुम रो रही हो?”
“नहीं,
आँखों में कुछ चला गया।”
“ओह अच्छा,
मुझे लगा तुम रो रही हो।”
“अच्छा चलो,
मैं करता हूँ फोन तुम्हें।”
“बाय...” कहने से पहले ही
फोन कट गया।
फिर न उधर से
कभी कोई जवाब आया,
न मैंने भी
ज़हमत की।
किसी रात
मैंने खुद से पूछा—
मैं अपने अनुभवों को
कविताओं में क्यों नहीं लिखती?
लोगों को
कुछ सीखने का
कोई मौका क्यों नहीं देती?
बगल में चलता पंखा
जैसे कोई धीमा-सा राग सुन रहा था,
मेरी कोरी डायरी का पन्ना
मुझसे ही
कुछ शब्द माँग रहा था।
मैंने कलम उठाई।
रास्ते मुश्किल थे मगर,
पैरों ने रुकने से इनकार कर दिया।
हर राह पर
खुद को पाया,
हर आहट ने
मेरा ही दीदार किया।
देखते ही देखते
लोगों को मेरा लिखा
पसंद आने लगा।
वे मेरे लिखे हुए से
जुड़ने लगे।
किसी ने कहा—
“अरे, आपके साथ
हम अपने पापा के घर
फिर हो आए।”
किसी ने पूछा—
“आपको कैसे
मेरे मन की बात पता चल गई?”
किसी ने कहा—
“शुक्रिया,
मेरे सवालों के जवाब देने के लिए।”
तब पहली बार लगा—
शायद
मुझमें भी कुछ ख़ास है।
जिस दर्द को
मैं कभी अपनी कमजोरी समझती थी,
वही किसी और के लिए
शब्दों का सहारा बन रहा था।
फिर एक दिन
फोन के संदेशों में
फिर एक जाना-पहचाना नंबर दिखाई दिया।
“हेलो, कैसी हो?
और क्या चल रहा है जीवन में?”
थोड़ा समय लिया,
फिर लिखा—
“ठीक।”
वैसे
“ठीक” से ज़्यादा
कुछ बताना ही नहीं था।
जैसे कुछ बाकियों के नंबर थे,
यह नंबर भी
अब बाकियों में ही बदल गया था।
आगे कुछ लिखने की
ज़हमत नहीं हुई,
क्योंकि अब
बात को आगे बढ़ाने का
मेरा मन नहीं था।
फोन रखा,
अपनी डायरी उठाई,
और इस किस्से को भी
कविता का
एक सुंदर रूप दे दिया।
कभी जिस कहानी को
अपने भीतर छुपाकर रखा था,
अब वही शब्द बनकर
लोगों तक पहुँचने लगी।
तब समझ आया—
वह प्रेम
भले ही मेरा नहीं हुआ,
लेकिन उससे निकले शब्द
मेरे हो गए।
और शायद
यही उस अधूरे प्रेम की
सबसे खूबसूरत
पूरी कहानी थी—
उसने मुझे किसी का नहीं बनाया,
उसने मुझे
मेरा बना दिया।