विज्ञापन

पापा का घर।

Anupama Arya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पर आज,
        
                                                    
                            
जब उन बातों को याद करती हूँ,
तो उनके शब्दों से ज़्यादा
उनकी खामोशियाँ समझ आने लगी हैं।

तब हम बच्चे थे।

हम उनकी आँखों की नमी को भी
बस आँख में धूल चली जाना समझते थे।

किसी के दो टॉफ़ी
या बिस्कुट दे देने भर से
हम सचमुच बहल भी जाते थे।

हमारे हिस्से में
एक सुंदर परिवार की तस्वीर थी।

जिसमें दादा-दादी थे,
खुला-सा आँगन था,
एक पुराना दरवाज़ा था,
और पापा का अपना कमरा था।

पर उस तस्वीर के पीछे
एक और तस्वीर भी थी,
जिसे शायद
सिर्फ़ पापा देख पाते थे।

जब भी
वह अपने आँगन का ज़िक्र करते,
अपनी माँ के हाथ के बने खाने की बात करते,
लगता था—
पूरा गाँव
उनकी आँखों में उतर आया हो।

हम बहनें
मन ही मन खुश हो जाती थीं।

लगता था,
आज फिर
पापा के बचपन का
कोई नया किस्सा सुनने मिलेगा।

ऐसा लगता था,
जैसे उस गाँव का हर मोड़
उन्हें नाम लेकर बुलाता हो।

हर गली,
हर पेड़,
हर रास्ता
उनके कदमों को पहचानता था।

वह उस घर को
सिर्फ़ ईंट और रेत से नहीं,
अपनी यादों से
ज़िंदा रखना चाहते थे।

शायद इसीलिए
आँगन में बैठकर
अपने बुढ़ापे का सपना भी
वहीं देखा करते थे।

पर धीरे-धीरे
लोग छूटते गए।

और उनके साथ
घर की साँसें भी
हल्की पड़ती गईं।

फिर भी
वह शहर और गाँव के बीच
खींची हुई उस पतली-सी लकीर को
मिटाना चाहते थे।

जैसे एक बार फिर
दौड़कर वहाँ पहुँच जाएँ,
जिस आँगन में
उनका बचपन बीता था।

जैसे वह पुराना दरवाज़ा
आज भी आधा खुला हो,
और बाहें फैलाए
उनके लौट आने का
इंतज़ार कर रहा हो।

शायद सारी उम्र
वह सिर्फ़ एक घर नहीं,
अपने लोगों तक
लौटना चाहते थे।
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all