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मन के जज़्बात

Anupama Arya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन के जज़्बात
        
                                                    
                            
जब मन में ही रह जाते हैं,
तो क्या कह देने भर से
वे सचमुच हल हो जाते हैं?
लोगों ने कहा—
किसी से अपने मन की बात कहो,
मन हल्का हो जाएगा।
पर क्या
हर सुनने वाला
समझ भी पाता है?
कई बार
सामने बैठा इंसान भी
अपनी ही उलझनों में घिरा होता है।
उसके कमरे का
आधा खुला दरवाज़ा,
हल्की हवा में हिलता पर्दा,
और मेज़ पर रखा
ठंडी हो चुकी चाय का गिलास—
शायद उसकी कहानी
उससे पहले कह देते हों।
उसके हिस्से की चुप्पियाँ भी
कम नहीं होतीं।
फिर दो उलझे हुए लोग
एक-दूसरे की गाँठें
कैसे खोलेंगे?
मैंने भी
कई बार कोशिश की।
कुछ बातें
होठों तक आकर लौट गईं,
कुछ कागज़ों पर उतर गईं।
तब जाना—
मेरी कलम
मेरी सबसे धैर्यवान श्रोता है।
वह कभी बीच में नहीं टोकती,
न ही मेरे शब्दों का अर्थ पूछती है।
बस चुपचाप
हर अधूरी बात को
अपने भीतर रख लेती है।
पर जो लिख नहीं सकते,
उनका क्या?
क्या उन्हें भी
कोई ऐसा किनारा मिलता होगा,
जहाँ बिना बोले ही
उन्हें समझ लिया जाता हो?
क्या कभी
वे अपनी अधूरी कहानियाँ
किनारे की रेत पर लिखते होंगे?
और फिर
समुद्र की एक लहर
उन्हें धीरे से मिटा देती होगी।
वे देर तक
उसी मिटती हुई लिखावट को
देखते रहते होंगे।
शायद
कुछ आँसू
बारिश बनकर बह जाते होंगे,
और कुछ
मन की मिट्टी में
चुपचाप दबे रह जाते होंगे।
कभी
किसी किताब के किसी किरदार में
अपना ही चेहरा खोजते होंगे।
और जब
कहीं भी उत्तर नहीं मिलता होगा,
तो शायद...
एक और दिन
उसी मुस्कुराते चेहरे के साथ
दुनिया के बीच लौट आते होंगे,
और अपना सबसे बड़ा दर्द
फिर से
अपने ही भीतर रख लेते होंगे।
2 महीने पहले
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