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कमरे के इस एकांत कोने में

Anupama Arya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कमरे के इस एकांत कोने में,
        
                                                    
                            
मैं हूँ।
कुछ बिखरा हुआ सामान है।
और सामने से आती हुई धूप की
एक पतली-सी लकीर...
जो फर्श पर पड़े सामान को
धीरे-धीरे छू रही है,
जैसे कोई पुराना दोस्त
दबे पाँव कमरे में चला आया हो।
बिस्तर पर बिछी एक चादर...
सूरज की इस हल्की गर्माहट में
चुपचाप खुल जाती है।
सामने पड़ी खाली कुर्सियों पर
एक अजीब-सी ख़ामोशी पसरी हुई है।
ऐसा लगता है,
जैसे यह कमरा
कई महीनों से बंद था।
और इन दीवारों को
सफ़ेद सिर्फ़ इसलिए किया गया...
ताकि मैं
इन पर अपने मन की
लिखावट लिख सकूँ।
सामने टँगी
समुद्र की कुछ पुरानी तस्वीरें हैं।
उन्हें देखते ही
बंद आँखों के भीतर
वे किसी चलचित्र की तरह
जीवित हो उठती हैं।
मैं आँखें बंद करती हूँ...
और जाने कब
फिर उसी समुद्र के किनारे पहुँच जाती हूँ,
जहाँ कभी
नंगे पाँव चलना
सबसे बड़ी खुशी हुआ करता था।
आज भी
वहाँ कुछ ऐसा है,
जो मुझे
अपनी ओर बुलाता रहता है।
दूर-दराज़ से
कई मुसाफ़िर
अपने-अपने गंतव्य की ओर लौटते दिखाई देते हैं।
और मैं...
हर बार
उसी मोड़ पर ठहर जाती हूँ,
जहाँ से
अपने घर का रास्ता
पहचानना मुश्किल हो जाता है।
वहीं...
एक अधूरी-सी तस्वीर भी है,
जो बिना रंगों के ही
अधूरी रह गई।
फिर जाने कब
मैं वापस
उसी कमरे में लौट आती हूँ।
अचानक...
किचन से
किसी उत्सव जैसी महक आती है,
जैसे वहाँ
कुछ बहुत बन रहा हो...
उसी पल
सूने घर में
किसी बर्तन के गिरने की
तेज़ आवाज़ गूँजती है।
एक पल को लगता है...
जैसे कोई अपना
मुझसे मिलने आया हो।
पर जब आँख
मैं दरवाज़े की ओर देखती हूँ...
पर वहाँ
कोई नहीं होता।
कमरा फिर से
उतना ही शांत हो जाता है।
चेहरे पर
वही पुरानी उदासी
धीरे-धीरे लौट आती है।
ठीक वैसे ही...
जैसे आसमान में
डोर से कटकर
कोई पतंग
हवा के भरोसे
धीरे-धीरे दूर चली जाती हो।
2 महीने पहले
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