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“अकेला घर कैसा लगता होगा?”

Anupama Arya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            किसी ने पूछा—
        
                                                    
                            
“अकेला घर कैसा लगता होगा?”

जहाँ अपने ही
अपना नया पता ढूँढ लेते हैं।

मैं क्या जवाब देता
उस नादान को?

मेरी इन दीवारों के कान
बरसों से
बहरे और सूने रहते हैं।

यहाँ घर के सदस्यों की गिनती
हर साल उल्टी होती है,
और बातों की औपचारिकता
कैलेंडर पर दिखाई देने लगती है।

बैठक में पड़ी तस्वीरें
बच्चों के बचपन से बड़े होने तक
सिर्फ़ बचपन की कहानी सुनाती हैं।

कुछ कमरों में
अपनों की जगह
नए किराएदार आ गए हैं।

एक-दो कमरे
अब भी वैसे ही छोड़े हैं—
उन यात्रियों के लिए
जो कभी आएँगे
अपना सामान लेने।

लोग यहाँ वापस आकर भी
अब तकल्लुफ़ करते हैं—

“मैं वो कमरा इस्तेमाल कर लूँ?”

कभी जिन कमरों में
बिना दस्तक के घुस जाते थे,
अब उन्हीं के लिए
इजाज़त माँगते हैं।

किचन में पहुँचकर
कुछ पल ठिठकते हैं—

“पानी का गिलास
कहाँ रखा है?”

जिस रसोई में कभी
अपनी पसंद का खाना
बनवाने के लिए
हुक्म चला करते थे,
अब वहाँ भी
किसी और के घर जैसी
सावधानी बरतते हैं।

पड़ोसियों से
अब अजनबी की तरह मिलते हैं,
और अपने ही घर में आकर
घड़ी देख लेते हैं—

“चलें?”

दरवाज़ा भी अब
पहले की तरह
धड़ल्ले से नहीं खुलता।

पहले हाथ
कुंडी तक पहुँचता था,
अब उँगली
घंटी ढूँढती है।

दरवाज़ा खुलता है—
सामने अपने लोग होते हैं,
पर सफ़र की थकान
चेहरों पर पहले पहुँच चुकी होती है।

“कैसे हो?”

“ठीक।”

“मैं भी ठीक।”

बात
यहीं रुक जाती है।

फिर किसी की नज़र
दीवारों पर जाती है—

“दीवारों का रंग
शायद बदल दिया है।”

“यह कुर्सी
पहले कहीं और थी।”

“मैं एक बार
अपना पुराना कमरा
देख आऊँ?”

फिर अचानक
पापा पर नज़र ठहरती है—

“पापा,
आपके पैरों में
तकलीफ़ है क्या?”

“मैं शायद पहले आई थी,
तब तो ठीक थे।”

और घर
चुपचाप सुनता रहता है।

माँ को प्यास लगती है—

“पानी का गिलास
कहाँ रखा है?”

कोई हँसकर कहता है—

“यह देखो,
तुम्हारे लिए साड़ी
और पापा के लिए शॉल लाई हूँ।”

फिर वही आवाज़
थोड़ी धीमी पड़ जाती है—

“इस बार
सिर्फ़ तीन दिन का प्रोग्राम बना है…”

“अपने साथ
वापसी की टिकट भी लाई हूँ।”

तीन दिन।

बस तीन दिन के लिए
लौटेंगे वे लोग
जिनके नाम कभी
इस घर की हर चीज़ पर लिखे थे।

तीन दिन बाद
फिर वही कमरे होंगे,
वही दीवारें,
वही तस्वीरें—

बस आवाज़ें
फिर कम हो जाएँगी।

शायद इसी को
अकेला घर कहते हैं—

जहाँ लोग
लौट तो आते हैं,

पर अपने साथ
रुकने का समय नहीं लाते।

जहाँ दरवाज़े
अब भी अपनों के लिए खुलते हैं,

मगर घर जानता है—

वे फिर जाएँगे।

और शायद इसलिए
कुछ घरों में
सन्नाटा खाली कमरों से नहीं होता,

वह उन लोगों की
वापसी की टिकटों से होता है
जो कभी उस घर के
हमेशा के रहने वाले थे।
6 घंटे पहले
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