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समझूँगा तब जग का पहरा, भारी था क्यों इस दिल पर।

Anubhav Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक ठिकाना ढूँढ़ रहा हूँ, जीवन-साँझ बिताने को,
        
                                                    
                            
रास नहीं आता है मुझको, आज ये रूप ज़माने को।

चौखट लाँघूँ तो डरता हूँ, ऐसा पहरा वक़्त का है,
पर घर छोड़े बिना गुज़ारा, कहाँ किसी कमबख़्त का है।

आस लगी है उस आँगन में, सुख की मंद बयार बहेगी,
मन-मर्जी के ख़्वाब बुनूँगा, जहाँ न कोई रोक रहेगी।

फिर मैं हँसकर लौट आऊंगा, अपने उसी ठिकाने पर,
समझूँगा तब जग का पहरा, भारी था क्यों इस दिल पर।
3 घंटे पहले
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