अवधपुरी के रघुकुल में राजा दशरथ भये महान।
चक्रवर्ती सम्राट ,ख्यातिलब्ध सकल गुण निधान।।
फैली चारों ओर समृद्धि,खुशहाली।
राजा को एक था गम, नहीं थी कोई उनको संतान।।
किया यज्ञ पाये वरदान, मिले उन्हें अति गुणी संतान।
तीनों रानियों से दिये उपहार,पाया उन्होंने चार संतान।।
सुमित्रा ने लखन-शत्रुघ्न,मां कौशल्या ने जाये राम।
एक संतान माता कैकेयी के, नाम उनका भरत महान।।
राजा दशरथ का यह संकल्प,राजा होंगे जय श्री राम।
भड़काया कैकेयी को दासी मन्थरा ने,बनें राजा भरत महान।।
कोपभवन में रानी कैकेयी, मना रहे उनको दशरथ महान।
लिया सहारा कैकेयी ने वचनों का,मांग लिया वरदान ।।
14 वर्ष का वन गमन राम को,राज्य दे दो सुत भरत महान।
हुए अचेतन राजा दशरथ, व्याकुल नगरी,सकल सुजान।।
चले वन को संग लखन सिया और राजा राम।
हो गये व्याकुल राजा दशरथ,तज दी पुत्र मोह में अपनी जान।।
समाचार सुन भाई भरत, पहुंचे निज राज्य,निज धाम।
पश्चाताप करते निज मात का, मिलने पहुंचे भ्रात सुजान।।
चित्रकूट, मंदाकिनी तट, बहे नदी अश्रु मिलन की धार।
भ्रात्र प्रेम का अद्भुत संगम,देख रहा यह अविरल संसार।।
लौट चलो हे भ्राता रामजी, तुम बिन सूना है संसार।
मिटे कलंक मेरे माथे का,भाई भरत करते मनुहार।।
रघुकुल रीति में प्राणों से बढ़ कर हैं वचन, कराया ध्यान।
चरण पादुका लेकर लौटे,रख सिंहासन चलाया विधान।।
-क्षमा सिंह