विज्ञापन

काश और ख़ैर

Ansh Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            किसी ने मेरी आँखों का सफ़र पढ़ा ही नहीं,
        
                                                    
                            
मैं उम्र भर सामने था, मगर दिखा ही नहीं।

वो रोज़ मेरी ख़ामोशियों के पास से गुज़री,
मेरे लबों पे जो था, वो कभी लिखा ही नहीं।

ये सोचकर मैं अपने ग़म से समझौता कर गया,
वो मेरी नहीं सही, किसी और की भी तो नहीं।

मगर एक रोज़ किसी ने उसका हाथ यूँ थाम लिया,
उस दिन के बाद मेरा कोई सिलसिला ही नहीं।

अब उसके शहर से गुज़रता हूँ अजनबी बनकर,
मेरा पता तो वही है, मगर मैं वहाँ रहा ही नहीं।

लोग पूछते हैं, इतना हँसते क्यों हो हरदम,
कैसे बताऊँ कि मैं मुद्दतों से हँसा ही नहीं।

मेरी ख़ामोशी को कमज़ोरी समझने वालों,
जो टूटकर भी न बिखरे, वो आईना ही नहीं।

अगर कभी उसे मेरी दुआओँ की ख़बर पहुँचे,
कहेगी—एक शख़्स था, जो कभी मिला ही नहीं।

मैंने चाहत को हवाओं की तरह छुपकर जिया,
मेरी मोहब्बत का किसी पर भी दावा ही नहीं।

 
15 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

sunil kumar

181 कविताएं

View Profile

Anita Chaturvedi

161 कविताएं

View Profile

RATAN KUMAR

578 कविताएं

View Profile