आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

काश और ख़ैर

                
                                                         
                            किसी ने मेरी आँखों का सफ़र पढ़ा ही नहीं,
                                                                 
                            
मैं उम्र भर सामने था, मगर दिखा ही नहीं।

वो रोज़ मेरी ख़ामोशियों के पास से गुज़री,
मेरे लबों पे जो था, वो कभी लिखा ही नहीं।

ये सोचकर मैं अपने ग़म से समझौता कर गया,
वो मेरी नहीं सही, किसी और की भी तो नहीं।

मगर एक रोज़ किसी ने उसका हाथ यूँ थाम लिया,
उस दिन के बाद मेरा कोई सिलसिला ही नहीं।

अब उसके शहर से गुज़रता हूँ अजनबी बनकर,
मेरा पता तो वही है, मगर मैं वहाँ रहा ही नहीं।

लोग पूछते हैं, इतना हँसते क्यों हो हरदम,
कैसे बताऊँ कि मैं मुद्दतों से हँसा ही नहीं।

मेरी ख़ामोशी को कमज़ोरी समझने वालों,
जो टूटकर भी न बिखरे, वो आईना ही नहीं।

अगर कभी उसे मेरी दुआओँ की ख़बर पहुँचे,
कहेगी—एक शख़्स था, जो कभी मिला ही नहीं।

मैंने चाहत को हवाओं की तरह छुपकर जिया,
मेरी मोहब्बत का किसी पर भी दावा ही नहीं।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
13 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर