कभी महफ़िल का सबसे बोलता चेहरा हुआ करता था मैं,
फिर अपनी ही ख़ामोशी का पहरा हुआ करता था मैं।
मोहब्बत ने भी मुझको एक दफ़ा अपना कहा था यूँ,
मगर तक़दीर से बिछड़ा हुआ रिश्ता हुआ करता था मैं।
झुकाना चाहती थी ज़िंदगी हर मोड़ पर लेकिन,
मेरे किरदार का सबसे बड़ा क़िस्सा—अना था मैं।
कभी तख़्त-ए-इल्म पर नाम मेरा सबसे ऊपर था,
फिर अपनी ही नज़र में हारता लड़का हुआ करता था मैं।
समझने की कोशिशें सबने बहुत की, मगर आख़िर,
जो सीने में था, लब तक ला न पाया—वह धुआँ था मैं।
रातों में तकिए ने जितनी दफ़ा आँसू गिने मेरे,
सुबह लोगों को लगा, बेफ़िक्र-सा हँसता हुआ मैं।
अब आँसू भी नहीं आते, शिकायत भी नहीं होती,
समंदर सूख जाने के बाद बचा बस पत्थर था मैं।
न किसी के लौट आने की तमन्ना, न कोई इंतज़ार,
जो चला गया, उसे जाने दिया—बस फ़ैसला था मैं।
मुझे पहचानना हो तो मेरी ख़ामोशियाँ पढ़ना,
हर इक लफ़्ज़ से पहले जो ठहरा है, वही "अभ्र" था मैं।