लहरों के लौटने से क्या शिकायत क्या गिला।
साथ चलना हो फिर भी रख मुनासिब फासला।।
रात को भाते जो तारे दिन में कुछ न मूल्य है।
साथ चलकर साथ ना हो साथ वो निर्मूल्य है।।
टहनियों के शिखर पर तूफान से जो लड़ रहा।
जीतता हर जंग फिर भी वो बया का घोंसला।।
बढ़ रही है ये उम्र या यूं कहें कि घट रही है।
दरमियां थी खाई जो लग रहा अब पट रही है।।
आज के फकीर हैं जो कल थे ताजो तख्त पर।
शिखर से शून्य का ये सदियों से चलता सिलसिला।।
लहरों के लौटने से क्या शिकायत क्या गिला।
साथ चलना हो फिर भी रख मुनासिब फासला।।