स्मृतियों के वातायन से जब झाँक अतीत निहारूँ मैं
सोच सोच कर वर्तमान को मन ही मन धिक्कारूँ मैं
ऋचा मंत्र से गूंजा करते जहाँ दिशा के कोने थे
माटी भी चंदन थी जिसकी कंकर सारे सोने थे
हर आंगन में ब्रह्म ज्ञान की अविरल गंगा बहती थी
विश्व गुरु के भाल तिलक पर सूर्य किरण तक रहती थी
ऋषि मुनियों के तपो तेज से पल्लवित यहाँ रवानी है
अब लगता है पुण्य धरा की केवल शेष कहानी है
जिसने वसुधैव कुटुम्बकम् का दुनिया को था पाठ दिया
उसी देश ने स्वार्थ सिद्धि में अपना आंगन काट लिया
मखमल की चाहत में हमने खोए सूत के वे तागे
अंधी दौड़ प्रगति की जिसमें सत्य अहिंसा सब भागे
परिधानों के नंगेपन को हम कहते अब आज़ादी
पाश्चात्य के जूठे टुकड़ों पर नीलाम हुई मर्यादा भी
अपनी ही संस्कृति से कटकर इतराती तरुणाई है
हमने कंचन के मृग पीछे अपनी सीता गंवाई है
मूल्य हीन इस नव युग की तो विक्षिप्त हुई अब बानी है
अब लगता है पुण्य धरा की केवल शेष कहानी है
गगन चूमती अट्टालिकाओं ने छेंक लिया है अंबर को
किन्तु सिकुड़ती संवेदनाएँ देख रहा मैं अंदर को
आभासी इस जाल में फँसकर अपनों के ही कर छूट गए
झूठे इस प्रदर्शन की खातिर रक्त के रिश्ते टूट गए
तथाकथित इस स्वर्ण युग में कैसा गज़ब विकास हुआ
भीड़ भयंकर है सड़कों पर पर मन का वनवास हुआ
भौतिकता की इस वेदी पर भस्म हुई है सादगी
यंत्रों के पुर्जों में दबकर सिसक रहा है आदमी
झूठे इस उत्कर्ष का चोला बस मन की नादानी है
अब लगता है पुण्य धरा की केवल शेष कहानी है
अर्थ युग के इस कोलाहल में धर्म हो गया है व्यापार
पुण्यों की मंडी सजी यहाँ बिकते हैं अब संस्कार
परोपकार की बातें अब तो केवल भाषण में सजतीं
भूखे की क्रंदन ध्वनि अब किसी हृदय को ना मथती
सोने की लंका पाने को राम राज्य को छोड़ दिया
क्षण भंगुर इस चमक दमक पर शाश्वत पथ से मुँह मोड़ लिया
हम भूल गए वो त्याग समर्पण जो पुरखों की पूँजी थी
जिसके बल पर विश्व पटल पर अपनी कीर्ति गूंजी थी
अब तो कंक्रीट के जंगलों की पत्थर सी ज़िंदगानी है
अब लगता है पुण्य धरा की केवल शेष कहानी है
दर्पण झूठा नहीं है साथी अक्स हमारा मैला है
आस्तीन में दूध पी रहा जो विषधर वो विषैला है
अपने घर की खिड़की तोड़कर मांग रहे हम उजियाला
मदिरालय के बाहर फेंका अमृत का पावन प्याला
संस्कारों के भग्नावशेष पर हम जश्न मनाते फिरते हैं
स्वयं की जड़ को काट काट कर हम कितना नीचे गिरते हैं
ज़रा सोच कर देखो हमने क्या पाकर क्या है खो डाला
विषम ज्वर के इस भ्रम को हमने कैसे स्वास्थ्य है मान डाला
कवि रंज कहे हे मोह ग्रसित यह अंधों की राजधानी है
अब लगता है पुण्य धरा की केवल शेष कहानी है
-भानु शर्मा