अख़बार अब अख़बार न रहा, सच का वह अधिकार न रहा,
स्याही बिकने लगी जहाँ से, शब्दों में वह अब धार न रहा।
सुबह-सुबह जो घर-घर पहुँचे, जागृति का संदेश लिए,
अब हर पन्ना पूछ रहा है, क्यों निष्पक्ष विचार न रहा।
शीर्षक ऊँचे, शोर बहुत है, भीतर लेकिन सन्नाटा है,
सत्य दबा विज्ञापनों में, जनता का अख़बार न रहा।
फिर लौट आई है वही राजतंत्र की हुकूमत,
लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र पर विश्वास न रहा।
सच की आवाज़ दब गई सत्ता के शोर तले,
अब आईनों को भी अपने ही प्रतिबिंब का अहसास न रहा।
"अख़बार अब अख़बार न रहा"
- रविकुमार खोब्रागड़े