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रविवार (नज़्म)

Anmol Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रविवार (नज़्म)
        
                                                    
                            

पहला दिन है ये हफ्ते का
और बहुत ही प्यारा है
थके-टूटे बदन का एक
यही तो सहारा है

2-3 दिन पहले से ही
ख़ुमार में खो जाते हैं
हम शुक्रवार से ही
रविवार में खो जाते हैं

क्या बताएं इसमें सुकून कैसा है
इसका मेरे सर पर जुनून कैसा है
इसके भरोसे पे कितने काम टाले हैं
इससे वाबस्ता कितने ही ख़्वाब पाले हैं

ये आयेगा तो ये होगा कि वो होगा
क्या जितना सोच रखा है मैने वो सब होगा
किसी माशूका की तरह राह इसका देखते हैं
बड़ी हसरत से तुझे जान मेरी देखते हैं

हाय वो देर से उठना वो उबासी लेना
अधखुली आँख से फिर चाय या कॉफी लेना
उनको पीते हुए अख़बार को पढ़ना सोचो
फिर सारे काम का आराम से करना सोचो

बाद में अपना नहाना और नाश्ता करना
और फिर दोस्त, रिश्तेदारों का रस्ता तकना
कितना आराम है इस एक रविवार में
इतना आराम कहां सोम, मंगल या बुधवार में

जान मेरी तु क्यों आती है चली जाती है
फिर मुझे 6 दिनों तक नहीं मिल पाती है।
-अनमोल
2 महीने पहले
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