माया के ख़त का जवाब (नज़्म)
माया ! कल तुम्हारा ख़त मिला
पढ़कर मानो जिस्म में एक
ठंडी बिजली सी कौंध गई है
जो भी जज़्बात बचे थे
आधे पके - आधे कच्चे दिल में
उन सबको वो चिठ्ठी रौंद गई है
तुमने जो मांगा है वो लौटाना
मेरे बस की बात नहीं है
जिस सावन के दिन की
तुमने उसमें बात कही है,
सच मानो, अब वो मेरे साथ नहीं है
वो गीले दिन और गीली रातें
तुम्हारे जाते ही किसी भाँप के जैसे उड़ से गए हैं,
जिन रास्तों पर हम चलते थे
जाने अब वो भी कहां मुड़ से गए हैं
जिन पतझड़ के पत्तों की तुमने बात कही है
मैं भी उन पत्तों के जैसा हूं तन्हा सा
जिन पत्तों के गिरने की तुमने बात कही है
उनके साथ न जाने कितने
अपने अश्क के मोती मैने खो डाले हैं
वो मोती तुमको अब कैसे लौटा दूं
सच कहूं तो मुझमें अब हिम्मत नहीं कि
उस कांपती शाख़ को मैं गिरा दूं
बताओ कैसे गिरा दूं
हां जब उस छतरी में हम तुम
भीग रहे थे, याद है मुझको
अब भी उस छतरी में मैने
लम्स पाया है तुम्हारा
तुम तो नहीं हो, कम से कम
इस लम्स को तो न माँगो
इस पर बस मेरा हक़ है
बोलो मैं कैसे लौटा दूं
उस बिस्तर पर जिसमें तुम्हारा
गीला मन अब भी धड़क रहा है
उसको तो मैने कभी छुआ नहीं है
अब भी वो तुम्हारे दिल के जैसा
मैंने अपने पास रखा है
बोलो, क्या भिजवा दूं?
नहीं रहने दो मेरी हिफाज़त में
एक सौ सोलह चांद की रातें
और हमारी प्यारी बातें
याद है मुझको अब भी सबकुछ
भूला नहीं हूं अब भी सबकुछ
वो रातें न मेरी थीं माया
और न वो कभी तुम्हारी थीं
वो गुज़िश्ता वक्त के जैसे
गुज़र गईं हैं
कैसे लौटा दूं?
मेरे कांधे के तिल तो तुमको याद है अब तक
पर मेरे होठों की हंसी अभी तक गुम है
देखो शायद तुमने अपने पास रखी हो
वो भिजवा दो
अभी बहुत कुछ बाकी है जो तुमको लौटाना है
अभी शायद एक मुलाक़ात और होगी।
-अनमोल