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निरुपाय पौरुष

Ankit Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हास्य कहो लिख दूँ कैसे,
        
                                                    
                            
मैं कैसे व्यंग्य सुनाऊँ अब !
देश जल रहा सड़को पर,
मैं कैसे जख्म दिखाऊं सब !

भारत माँ की अस्मित कैसे,
सड़कों पर लुट जाती है !
शर्म, लिहाज़ की सारी बातें,
चौराहों पर मिट जातीं हैं !

जीते जी ना पीर हर सके,
ऐसे निदान का क्या करना !
मृत्यु मिले पर न्याय नही,
ऐसे विधान का क्या करना !

मां गंगा का है घर जो,
उस देश में बहते नाले हैं !
राम, कृष्ण की धरती पर,
अब निशिचर बसने वाले हैं !

घटना है ना दुर्घटना है,
ये जननी का मृत्यु शोक है !
स्वर्ग नहीं है नहीं नर्क है,
ये दानवता का क्रूर लोक है !

अश्रु बहाता विवश खड़ा हूँ,
पौरुष निरुपाय हमारा है !
तुम हंसो, ठिठोली करलो अब,
ये तो व्यवसाय तुम्हारा है !

ये रोज रोज की बात नहीं,
ना अखबारों की खबरें हैं !
संप्रभु भारत के गौरव की,
ये विकसित होती कबरें हैं !

जिनपर थी ये जिम्मेदारी,
माँ की लाज बचाने की !
उन्ही ने कोई कसर न छोड़ी,
हैवानी यहाँ दिखाने की !

कहाँ गए हो राम मेरे अब,
अपना बाण चला दो तुम !
मुँह मत फेरो कृष्ण कन्हैया,
फिर से चीर बढ़ा दो तुम !

आज नहीं है यहाँ ज़रूरत,
सप्त सुरों की तानों की !
बड़ी जरूरत पड़ी आज है,
अर्जुन तेरे वाणों की !

वात्सल्य छोड़ दो माताओं,
दुष्टों का आज विनाश करो !
रूप त्याग कर करुणा का,
निर्मम क्रूरों का ह्रास करो !

चुप्पी का है समय नही,
कोई तो कुछ काम करो !
मेरी भारत माँ रोती है,
दामन मत बदनाम करो !


स्वरचित - अंकित सोमवंशी


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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