चाँदनी निशा की मुस्कुराहट बढ़ रही थी,
आदित्य आभा की मायूसी ढल रही थी।
प्रकृति खुशियाँ मना रही थी,
दिनार्ध के तकलीफ़ को भुला कर, संध्या के सुकून को अपना रही थी।