शहर के बीचों-बीच मैं अपना गांव ढूंढ़ रहा हूं
मैं भी कितना पागल गांव में शहर ढूंढ़ रहा हूं
शहर में धुआं धुआं है
मेरे गांव में कुआं है
आज के बच्चे क्या जानेंगे कुआं क्या होता है?
ढिबरी के पास बैठ कर पढ़ाई करना क्या होता है?
छोड़ दूंगा मैं आज शहर
सोचते सोचते हुआ दोपहर
है रेल में ठेलम ठेल
छूट गई बलिया मेल
अब कैसे अपने गांव जाऊं मैं?
गांव को शहर कैसे बनाऊं मैं?
मेरे गांव की सड़कें भले टूटी फूटी हैं
पर गांव में विकास की पहली किरण फूटी है
अपने गांव तक चौड़ी सड़क मैं बनवाऊंगा
अपने गांव को मैं चम चम चमकाऊंगा
मैं अपने गांव में एक विश्वविद्यालय खोलवाऊंगा
सारे ग्राम वासियों को मैं शिक्षित बनाऊंगा
बेटियों को बेटे से कम नहीं,ज्यादे पढ़ाऊंगा
अपने गुदरी सिंह के टोला को
अपने चिंतामणि राय टोला को
अपने किनु तिवारी के टोला को
विश्व पटल पर दिखाऊंगा
मैं अपने गांव को विकसित बनाऊंगा।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'