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मन मेरा गऊंवे में अटके

Ankit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सुबह सुबह चिड़िया चहके
        
                                                    
                            
मन मेरा गऊंवा में भटके
मन मेरा गऊंवे में अटके
शहर में खाया मैंने झटके
गऊंवा में दूध मिले टटके
मोटी छाली वाली दही
भोरे भोरे मिले सरगही
उसी दही के लिए मन भटके
शहर में चोरी से मन उलझे
हमर गऊंवा में मन सुलझे
रात भर दरवाजे खुले हैं
पर लोग प्यारे मिले-जुले हैं
न चोरी का डर है
न कोई फिकर है
यहां सब अपने हैं
शहर में सपने हैं
तो भी मेरा भाई
बन कर कसाई
चोरी चोरी चुपके चुपके
आकर चोर सा दुबके दुबके
बेच कर पुश्तैनी जमीं दिल्ली में भटके
पर मन मेरा गऊंवे में अटके।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
2 सप्ताह पहले
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