पिताजी जीवित थे तो समय मैं दिया नहीं
घर गया नहीं अस्पताल में समय दिया नहीं
पैर दबाया नहीं, सेवा सुश्रुवा मैं किया नहीं
नौकरी से छुट्टी लेकर उनको दिखाया नहीं
किया मन मेरा मनमानी,कोई त्याग किया नहीं
अब अवकाश लेकर गया घूम रहा हूं
पिंडदान करके बार बार उनका चित्र चूम रहा हूं
आत्मा की शांति हेतु वाराणसी घूम रहा हूं
खुद को धिक्कारता हूं
पत्नी की बात मानता हूं
पत्नी को मिला विशेषाधिकार है
मुझे बेटा होने पर धिक्कार है
भगवान! सजा मुझे देना स्वीकार है।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'