मुझमें है साहस अपार
कैसे मैं मानूं हार?
वीरता है मेरा श्रृंगार
धीरता है मेरा श्रृंगार
शत्रुओं से टकराता हूं
बाज सा उड़ जाता हूं
सिंह सा सदा दहाड़ता हूं
पंजों से शत्रुओं को फाड़ता हूं
तिरंगे को निहारता हूं
अंबर से हाथ मिलाता हूं
बाधाओं से नहीं घबराता हूं
राह अपना अपने मैं बनाता हूं
कांटों में राह बनाता हूं
पर्वतों में राह बनाता हूं
चाहता हूं धरा का करूं उद्धार
मुझमें है साहस अपार
कैसे मैं मानूं हार?
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'