आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पंजों से शत्रुओं को फाड़ता हूं

                
                                                         
                            मुझमें है साहस अपार
                                                                 
                            
कैसे मैं मानूं हार?
वीरता है मेरा श्रृंगार
धीरता है मेरा श्रृंगार
शत्रुओं से टकराता हूं
बाज सा उड़ जाता हूं
सिंह सा सदा दहाड़ता हूं
पंजों से शत्रुओं को फाड़ता हूं
तिरंगे को निहारता हूं
अंबर से हाथ मिलाता हूं
बाधाओं से नहीं घबराता हूं
राह अपना अपने मैं बनाता हूं
कांटों में राह बनाता हूं
पर्वतों में राह बनाता हूं
चाहता हूं धरा का करूं उद्धार
मुझमें है साहस अपार
कैसे मैं मानूं हार?
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
45 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर